स्वामी विवेकानन्द और गाँधी जी के वेदान्त चिन्तन का साम्य

  • डाॅ0 ऋतु दीक्षित संस्कृत प्रवक्ताए न0पा0 कन्या (पी0जी0) काॅलेज, कासगंज (उ0प्र0

Abstract

अद्वैत वेदान्त को यथार्थ और युगानुकूल रूप से प्रस्तुत करने वालों में आधुनिक युग में स्वामी विवेकानन्द का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। स्वामी जी ने वेदान्त की युक्तिसंगत, विज्ञानसम्मत और संन्यासियों की ही वस्तु था या वह पंडितो की चर्चा का विषय। जनसाधारण वेदान्त के आदर्शाे को अपनी पहुँच से बहुत दूर का समझा करता था। स्वामी जी ने एक तरफ वेदान्तीय आदर्शाें की सरल व्याख्या कर उसे व्यवहार के धरातल पर अवतरित किया तो दूसरी ओर जनसाधारण को सामान्य स्तर से उठाकर आदर्शों की ऊँचाई तक लाने का प्रयत्न किया। आज के युग में दर्शन की कोरी चर्चाओं को अनावश्यक बतलाते हुए स्वामी जी ने कहा कि- ‘‘इन दार्शनिक चर्चाओं ने, इन न्याय के कूट विचारों ने किसी समय भले ही देश का हित किया हो, पर आज इनकी आवश्यकता नहीं है। जो दर्शन केवल बुद्धिवादियों की चहारदीवारी तक सीमित है उसका बुद्धिविलास के अतिरिक्त और कोई मूल्य नहीं।‘‘ साथ ही उन्होने यह सन्देश दिया कि आज वेदान्त को केवल साधु-संन्यासी अथवा कुछ मतवादियों के हाथों में ही सिमट कर नहीं रह जाना होगा, आज उसे जन-जीवन से सम्बद्ध होना पडेगा।

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Published
2018-04-11
Section
Articles