विवेकानन्द और गाँधी: धार्मिक अवधारणा

  • डाॅ0 सपना सिंह असि0 प्रोफेसर, समाजशास्त्र विभाग, टी0आर0 के0 महाविद्यालय, अलीगढ़

Abstract

विवेकानन्द के अनुसार धर्म शिक्षा और समाज के लिए पहली आवश्यकता है। वे कहते थे कि धर्म से मेरा अभिप्राय मेरा या किसी व्यक्ति विशेष का धर्म नहीं है, बल्कि वास्तविक तथा सच्चे तत्वों को जनता के सम्मुख रखने से है। पहले तो हमें उन महापुरुषों के जीवन को लोगों के सामने रखना चाहिए जो कि इन सनातन सत्यों को अपने जीवन में प्रयोग करके सिद्ध कर गए हैं, जैसे श्री रामचन्द्र, श्री कृष्ण, श्री हनुमान् तथा श्री रामकृष्ण आदि। आजकल के समय को श्री कृष्ण की मुरली की अपेक्षा उनकी गीता की कहीं अधिक आवष्यकता है। देश को-हम को एक ऐसे प्रभावशाली वीर की आवष्यकता है। गीता की पूजा घर-घर में हो, ऐसा चक्कर चला दो। आज हमारे देश को- हम को एक ऐसे प्रभावशाली वीर की आवश्यकता है, जिसकी नस-नस में रजोगुण की लहर उठ रही हो, जो सत्य की खोज में अपने जीवन की बाजी लगा दे, और जिसके पास बुद्धिरूपी तलवार तथा वैराग्यरूपी ढाल हो। आवश्यकता है ऐसे वीर तथा योद्धा की जो युद्ध-क्षेत्र में साहस को न जाने दे।

 

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Published
2018-04-11
Section
Articles