गाँधी जी का अर्थदर्शन व विवेकानंद

  • डाॅ0 प्रेमलता सिंह (प्रवक्ता हिन्दी विभाग) एन0ए0के0पी0 पी0जी0 कालेज, फर्रूखाबाद
  • विदुषी तिवारी प्रवक्ता एन0ए0के0पी0 पी0जी0 कालेज, फर्रूखाबाद

Abstract

स्वतंत्रता प्राप्ति के ७० वर्ष बाद भी इस महात्मा गाँधी के आर्थिक विचारों को नहीं भूल सकतेद्य भारत की विशिष्ट सामाजिक आर्थिक संरचना के परिपेक्ष्य में गाँधी जी का दर्शन आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना वह आजादी के पूर्व था। उनका सारा जीवन सामाजिक अन्याय, आर्थिक विषमता, शोषण, गरीब और उंच नीच के भेद भाव के विरुद्ध सतत संघर्ष में रहा है।
गांधी जी के विचारों का मूल आधार स्वामी विवेकानंद के विचारों से सम्बंधित है। दोनों ने ईश्वर की सच्च उपासना मानवता की सेवा को ही माना है। दोनों में राष्ट्रभक्ति की भवन कूट कूट कर भरी थी। ये आजीवन दलितों, गरीबों व असहायों की सेवा करते हुए समाज सुधार के कार्य में लगे रहे इन्हों ने भारत की सभी सभ्यता एवं संस्कृति को विश्व की सभी सभ्यता एवं संस्कृति में श्रेष्ठता को सिद्ध कर दिया है।

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Published
2018-04-11
Section
Articles