महिला सशक्तीकरण और सतत विकास

  • डाॅ0 कुसुम यादव1 1एसोसिएट प्रोफेसर,शिक्षा संकाय,चै0 चरण सिंह पी0जी0 कालेज, हेंवरा (इटावा)
  • एम. एड., शिक्षा संकाय,चै0 चरण सिंह पी0जी0 कालेज, हेंवरा (इटावा)

Abstract

प्राचीन काल से उत्तर वैदिक काल तक हर क्षेत्र मे नारी के त्याग, बलिदान, शौर्य व ममत्व का सचित्र वर्णन मिलता है। नारी का त्याग व बलिदान भारतीय संस्कृति की अमूल्य निधि है। समाज में जिस प्रकार पुरुष को महत्वपूर्ण माना जाता है। वैसे ही वर्तमान संदर्भ में नारी का स्थान भी अद्वितीय है। समाज में महिलाओं को उच्च ओहदा एवं उचित स्थान दिलाने के लिये उन्हें संगठित रूप में आज प्रस्तुत किया जाना बहुत आवश्यक है। इसी को ध्यान में रखते हुये सन् 2001 को महिला सशक्तिकरण वर्ष घोषित किया गया। महिलायें हमारे समाज का घटक हैं, लेकिन फिर भी उनके अधिकार प्राप्त करने में उन्हें बाधा है। महिलाओं को उनके अधिकार शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, नौकरियां, कौशल, निर्णय लेने का अधिकार, बेहतर जीवन स्तर और सम्मान। इसके अनुसंधान सवाल कागज है। क्या महिला अधिकारिता अर्थव्यवस्था के विकास के लिये जिम्मेदार है? महिला सशक्तिकरण और आर्थिक विकास निकटता से सम्बन्धित है। एक तरफ अकेले विकास पुरुषों और महिलाओं के बीच असमानता को चलाने में एक प्रमुख भूमिका निभा सकता है। दूसरी दिशा में महिलाओं को सशक्त बनाने के लिये विकास का लाभ हो सकता है। क्या इसका अर्थ यह है कि इन दो लीवरों में से सिर्फ एक को गति देने के लिये एक सशक्त वृत्त गति में लगायें।

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Published
2018-05-28
Section
Articles