पं0 दीनदयाल उपाध्याय का साहित्य

  • डाॅ0 नीता सिंह असिसटेंट प्रोफेसर, किशोरी रमण महाविद्यालय, मथुरा

Abstract

‘‘बड़े शौक से सुन रहा था जमाना,
तुम्हीं सो गये दास्तां कहते-कहते‘‘
पंडित जी का जीवन राष्ट्र को समर्पित जीवन था। उन्होंने शरीर का कण-कण व जीवन का क्षण-क्षण राष्ट्र के नाम कर दिया था। सारा देश उनका घर था, सारा समाज उनका परिवार। उनके जीवन का एक मात्र लक्ष्य राष्ट्रसेवा था। उनका मस्तिष्क अतीत से जुड़ा हुआ था, वर्तमान में सक्रिय वह भविष्य के लिए चिंतित रहता था। वे पाश्चात्य विचारधारा को प्रगति का प्रतीक नहीं मानते थे और न ही रूढ़िवादियों की तरह गली-सड़ी मान्यताओं और परंपराओं से चिपके रहते थे। व्यस्त जीवन में अध्ययन, मनन, चिन्तन और फिर लिखने का समय कहाँ से निकले इसके लिए दो स्थानों का प्रायः वे प्रयोग करते थे।

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Published
2018-03-25
Section
Articles