भारत का समन्वयवाद ही पूँजीवाद और तानाशाही के दोषों का हल है

  • डॉ. नीलम गुप्ता असिस्टेंट प्रोफेसर, राजनीति विभाग, जवाहर लाल नेहरू पी.जी. कॉलेज, एटा

Abstract

अब से प्रायः तीन हजार वर्ष पूर्व भारतवर्ष के जन-जीवन में कर्म, चेतना, क्रांति -भावना तथा महत्त्वाकांक्षाओं का उदय हुआ था और उस समय इस देश के समस्त समाज ने अपने-अपने क्षेत्र में उन महत्त्वाकांक्षाओं का प्रकटीकरण कला-कौशल तथा वाणिज्य व्यवसाय की उन्नति, छात्रबल के विकास तथा ब्राह्मणों द्वारा स्याम, इंडोचायना, चीन और जापान आदि में ज्ञानदीप के प्रकाश का प्रसार करके वृहत्तर भारत में सांस्कृतिक साम्राज्य की स्थापना द्वारा किया था। वह हमारा स्वर्णयुग था। ’कर्म, चेतना, जनजागरण और महत्त्वाकांक्षाओं’ के प्रकटीकरण की वह भावना भले ही कभी रुक गई हो परंतु जाह्नवी की धारा के सदृश वह पुनः अब प्रकट हो चली है, और संसार की कोई शक्ति इस प्रवाह को अब रोक नहीं सकती।’ उपरोक्त ओजस्वी उद्बोधन द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सहप्रांतीय प्रचारक श्री दीनदयालजी उपाध्याय ने लगभग डेढ़ घंटे तक दिए गए अपने धारा प्रवाहिक सारगर्भित भाषण में गाजियाबाद जिला संघ कार्यकर्ताओं को संघ कार्य में प्रगति करने को प्रेरणा देते हुए विदा किया।

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Published
2018-08-18
Section
Articles