एकात्म मानव दर्शन शिक्षा एवं शिक्षक

  • डॉ. रेनू सिंह असिस्टेंट प्रोफेसर, रक्षा अध्ययन विभाग, वी.एस.एस.डी. कालेज, कानपुर
  • आर.बी. सिंह असिस्टेंट प्रोफेसर, एम.एड. विभाग, वी.एस.एस.डी. कालेज, कानपुर

Abstract

उन्नीसवीं शताब्दी में अनेक विचार धाराओं ने जन्म लिया इसलिए इस शताब्दी में संघर्ष की आवधारणाएं प्रस्तुत की गईं। इसी के परिणाम स्वरूप वंशवाद सम्प्रदायवाद, जातिवाद, भाषावाद एवं क्षेत्रवाद जैसे विकट समस्याएं प्रारम्भ हुयीं। यद्यपि वर्तमान मंे वैज्ञानिक, चिन्तक व अर्थशास्त्री संघर्ष की बातों को नकारने लगे हैं। विभिन्न कारणों से सभ्यताओं के संघर्ष की दलील सही नहीं प्रतीत होती हैं इसलिए इसे ‘सभ्य बनाम असभ्य’ संघर्ष का नाम देना चाहिए। संघर्ष उन लोगों के मध्य है, जो सभ्य हैं और जो सभ्य नहीं हैं। सभ्य समाज लोकाचार और नियम कानून के आधार पर चलता है, प्रत्येक संस्कृति के उदार और सुसंस्कृत लोग नैतिकता, स्वतन्त्रता और पारस्परिक सम्मान को रक्षा के लिए एक दूसरे को जोड़ते हैं। वर्तमान दौर में जब असभ्यता का उल्लेख होता है तो इसका अर्थ तकनीकी और आर्थिक मानकों पर कमजोर वर्ग से नहीं अपितु यह विचारधारा असभ्यता ही है। वैचारिक असभ्यता आधुनिक जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप है।

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Published
2018-08-18
Section
Articles