भारतीयता पंडित दीनदयाल की नजर मे

  • डॉ. पूर्णेश नारायण सिंह एच.आर.पी.जी. कॉलेज, खलीलाबाद, संतकबीर नगर
  • डॉ. डी.एन. पांडे एच.आर.पी.जी. कॉलेज, खलीलाबाद, संतकबीर नगर

Abstract

पिछले एक हजार वर्ष में हमारे और दुनिया के इस संबंध में विकृति आ गई। हम गुलाम हो गए। हमारा संबंध बाहर के देशों से समानता का नहीं रहा। दासता ने हमारी शक्ति क्षीण कर दी। अब दुनिया के अन्य देशों के साथ सम्मानपूर्वक आदान-प्रदान नहीं रहा, अपितु उन्होंने जबरदस्ती हमको लूटा और बदले में दया के दानस्वरूप जूठन और भिक्षा दी। हमने लूट को रोकने के लिए शक्ति भर प्रयत्न किया और दया के दान को हमारे आत्मसम्मान ने ठुकराया। भिक्षा में भी कई बार विष ही दिया गया, अतः एक अविश्वास ने भी हमारे मन में जड़ जमा ली। हमने भारतीय की रक्षा के लिए सर्वबाह्य विचारों का विरोध किया। किंतु हमारा संबंध तो बाह्य सत्ताओं से आया ही था, दुनिया में होनेवाली विचारक्रांतियों का परिणाम हमारे ऊपर होना ही चाहिए, वह हुआ। शासन वर्ग ने भी हमारे अपनेपन को समाप्त करने के लिए अपनी संस्कृति और सभ्यता का बोझ हमारे ऊपर लादा और वह हमको अनिच्छा से ही कयों न हो, करना ही पड़ा। इसी एक हजार वर्ष का विकृत अवस्था का परिणाम आज का भारतवर्ष है।

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Published
2018-08-17
Section
Articles