भारतीय संस्कृति एवं एकात्म मानव दर्शन

  • डॉ. राकेश शुक्ल एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, वी.एस.एस.डी. कालेज, कानपुर

Abstract

’’संस्कृति का आशय होता है परिष्करण या परिमार्जन। इसे संस्कार के अर्थों में भी लिया जाता है।’’;1द्ध यह परिष्करण, परिमार्जन और संस्कार ग्रहण करने की प्रक्रिया मूलतः व्यक्ति विशेष में होती है लेकिन व्यक्तियों के समूह में जब यह प्रक्रिया सामूहिक रूप से चलती है तो उसे जातीय संस्कार कहते हैं। इस प्रकार की सामूहिक चेतना को संस्कृति कहना अधिक उपयुक्त है। संस्कृति का निर्माण एक दिन में नहीं हो जाता है, इसकी निर्मिति मानव सभ्यता के उद्भव से लेकर अद्यावधि हजारों वर्षों के सामूहिक प्रयत्नों का प्रतिफल है।

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Published
2018-08-17
Section
Articles