एकात्म मानव दर्शन तथा आर्थिक विचार

  • डॉ. आशारानी पाण्डेय एसोसिएट प्रोफेसर, संस्कृत दयानन्द गल्र्स पी.जी. कालेज, कानपुर

Abstract

वेद सृष्टि एवं जीवन से सम्बद्ध समग्र ज्ञान और विज्ञान के मूलाधार रूप ग्रन्थ हैं। इनमें वर्णित जीवन प्रक्रिया के मूलतत्व किसी स्थान विशेष से सम्बन्धित समुदाय, जाति या धर्म से आबद्ध आचरण तक सीमित न होकर सृष्टि में प्रवर्तित चेतन-अचेतन रूप समस्त जीव-जन्तुओं के अभ्युदय (सुख शान्ति समृद्धिमय कल्याण) के लिए विहित हुए हैं। वेदों की ’सर्वजनहिताय सर्वजनसुखाय’ परक उपर्युक्त जीवन-पद्धति का सिद्धान्त ही “एकात्म मानववाद’’ के रूप में परिभाषित एवं प्रवर्तित होता हुआ सर्वकालिक रूप से आज भी महापुरुषों एवं मनीषी चिन्तकों द्वारा समादृत तथा उपदिष्ट हो रहा है। इसी श्रृंखला में एक बड़ा नाम जनसंध नेता, महान विचारक एवं चिंतक दीनदयाल उपाध्याय का है। राजनीति, समाज और अर्थ को मानव मात्र के कल्याण से जोड़ने का जो एक सूत्र पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने दिया वो ’एकात्मक मानवदर्शन’ के रूप में विख्यात है।

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Published
2018-08-17
Section
Articles