एकात्म मानव दर्शनः एक सारभौमिक व्यावहारिक दर्शन

  • कुँवर कुलदीप चैहान असिस्टेंट प्रोफेसर, शिक्षा विभाग, छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर

Abstract

एकात्म मानववाद के रूप में युग पुरुष महामनीषी पंडित दीन दयाल उपाध्याय जी ने कहा कि हमारी संस्कृति, समाज व सृष्टि का ही नहीं, अपितु मानव के मन, बुद्धि, आत्मा और शरीर का समुच्चय है। उनके इसी विचार व दर्शन को ’एकात्म मानववाद’ का नाम दिया गया, जिसे अब एकात्म मानव-दर्शन के रूप में जाना जाता है। एकात्म मानव-दर्शन, राष्ट्रत्व के दो पारिभाषित लक्षणों को पुनर्जीवित करता है, जिन्हें ’’चिति” (राष्ट्र की आत्मा) और ’विराट’ (वह शक्ति जो राष्ट्र को ऊर्जा प्रदान करता है) कहते हैं। एकात्म मानव दर्शन में व्यष्टि से समष्टि तक सब एक ही सूत्र में गुंथित है। व्यक्ति का विकास हो, तो समाज विकसित होगा, समाज विकसित होगा तो राष्ट्र की उन्नति होगी, राष्ट्र के उन्नति से, विश्व का कल्याण होगा। इस सूत्र को पंडित दीनदयाल जी ने श्रीमद्भागवत से ग्रहण किया था, जिसकी मूल धारणा ’स्ट्रगल फार एक्जिस्टेंस’ नहीं, बल्कि ’अस्तित्व के लिए सहयोग’ है। भारतीय संस्कृति की मूल विशेषता यह है कि वह संपूर्ण जीवन का, संपूर्ण सृष्टि का संकलित विचार करती है। उसका दृष्टिकोण एकात्मवादी है। टुकड़े-टुकड़े में विचार करना विशेषज्ञ की दृष्टि से ठीक हो सकता है, परन्तु व्यावहारिक दृष्टि से उपयुक्त नहीं। पश्चिम की समस्या का मुख्य कारण उनका जीवन के संबंध में खण्डशः विचार करना तथा फिर उन सबको पैबंद लगाकर जोड़ने का प्रयत्न है।

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Published
2018-08-17
Section
Articles